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दुष्यंत कुमार - मत कहो, आकाश में कुहरा घना है

 मत कहो, आकाश में कुहरा घना है


मत कहो, आकाश में कुहरा घना है,

यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ।


सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से,

क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है ।


इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है,

हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है ।


पक्ष औ' प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं,

बात इतनी है कि कोई पुल बना है


रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,

आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।


हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,

शौक से डूबे जिसे भी डूबना है ।


दोस्तों ! अब मंच पर सुविधा नहीं है,

आजकल नेपथ्य में संभावना है ।

📝 दुष्यंत कुमार

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