दुष्यंत कुमार - घंटियों की आवाज़ कानों तक पहुंचती है
घंटियों की आवाज़ कानों तक पहुंचती है घंटियों की आवाज़ कानों तक पहुंचती है एक नदी जैसे दहानों तक पहुंचती है अब इसे क्य…
घंटियों की आवाज़ कानों तक पहुंचती है घंटियों की आवाज़ कानों तक पहुंचती है एक नदी जैसे दहानों तक पहुंचती है अब इसे क्य…
फ़िर धीरे-धीरे यहां का मौसम बदलने लगा है फिर धीरे-धीरे यहां का मौसम बदलने लगा है, वातावरण सो रहा था अब आंख मलने लगा है …
दुष्यंत कुमार कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए कहीं पे शाम सिरहाने लगा के बैठ गए ।…
मत कहो, आकाश में कुहरा घना है मत कहो, आकाश में कुहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है । सूर्य हमने भी नहीं देखा …
तूने ये हरसिंगार हिलाकर बुरा किया तूने ये हरसिंगार हिलाकर बुरा किया पांवों की सब जमीन को फूलों से ढंक लिया किससे कहें…
नज़र-नवाज़ नज़ारा बदल न जाए कहीं नज़र-नवाज़ नज़ारा बदल न जाए कहीं जरा-सी बात है मुँह से निकल न जाए कहीं वो देखते है त…
दुष्यंत कुमार - अपाहिज व्यथा को वहन कर रहा हूँ अपाहिज व्यथा को वहन कर रहा हूँ तुम्हारी कहन थी, कहन कर रहा हूँ ये दरवाज़…
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