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दुष्यंत कुमार- फिर धीरे-धीरे यहां का मौसम बदलने लगा है

फ़िर धीरे-धीरे यहां का मौसम बदलने लगा है


फिर धीरे-धीरे यहां का मौसम बदलने लगा है,

वातावरण सो रहा था अब आंख मलने लगा है


पिछले सफ़र की न पूछो , टूटा हुआ एक रथ है,

जो रुक गया था कहीं पर , फिर साथ चलने लगा है


हमको पता भी नहीं था , वो आग ठण्डी पड़ी थी,

जिस आग पर आज पानी सहसा उबलने लगा है


जो आदमी मर चुके थे , मौजूद है इस सभा में,

हर एक सच कल्पना से आगे निकलने लगा है


ये घोषणा हो चुकी है , मेला लगेगा यहां पर,

हर आदमी घर पहुंचकर , कपड़े बदलने लगा है


बातें बहुत हो रही है , मेरे-तुमहारे विषय में,

जो रासते में खड़ा था परवत पिघलने लगा है

📝 दुष्यंत कुमार

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