फ़िर धीरे-धीरे यहां का मौसम बदलने लगा है
फिर धीरे-धीरे यहां का मौसम बदलने लगा है,
वातावरण सो रहा था अब आंख मलने लगा है
पिछले सफ़र की न पूछो , टूटा हुआ एक रथ है,
जो रुक गया था कहीं पर , फिर साथ चलने लगा है
हमको पता भी नहीं था , वो आग ठण्डी पड़ी थी,
जिस आग पर आज पानी सहसा उबलने लगा है
जो आदमी मर चुके थे , मौजूद है इस सभा में,
हर एक सच कल्पना से आगे निकलने लगा है
ये घोषणा हो चुकी है , मेला लगेगा यहां पर,
हर आदमी घर पहुंचकर , कपड़े बदलने लगा है
बातें बहुत हो रही है , मेरे-तुमहारे विषय में,
जो रासते में खड़ा था परवत पिघलने लगा है
📝 दुष्यंत कुमार
